डि.के. तो हमेशा यही साबित करता रहेगा जो सच होगा....रही बात मेरे जनरल नॉलेज की तो ईतना बता दे की 2007 का आंदोलन राज्य अध्यापक संघ के साथ....
2013 का अध्यापक संविदा संघ के साथ....
2015 का आस के साथ....
मतलब यह के हर बार आंदोलन मे भाग लिया ओर करीब से ईन को महसुस किया .....बात यह है की...
जब भी सितंबर के आंदोलन की बात होती है....
" ये आम अध्यापको का अांदोलन था"...
परंतु पुर्व के आंदोलन की बात करो तो....???
कोई कहता ऱास का....
कोई कहता सास का ...
कोई कहका अससस का...
ये कहा का न्याय....
अरे आंदोलन करने वाले तो अामअध्यापक तो हमेशा वही रहे...ओर रहेंगे....बस जब जब संघ अध्यापक हीतो से दुर हुआ अध्यापक भी संघो से दुर हो कर नये रंग की छत्र छाया मे गया....
ओर युही जायेगा....
तो फिर संघो का ईतना गुणगान क्यु...क्यु हम आगे नही देखते...बस ये देख कर चलते है की फला संघ क्या कप रहा...फला संघ क्या कह रहा....
ये भी सच्चाई है की आज जो भी गतिविधि संघो मे हो रही है वो वो आस के विरोध मे ही संचालित हो रही है...
अरे आस कोई आसमान से उतरा संघ नही है...जो सब मिलकर उसको दिन रात कोस रहे...
तनिक चिंता अध्यापको की करो....
अध्यापक तो जहा हीत की बात होगी दौड. कर चला आयेगा....किसे के रोके नही रूकेगा...
चाहे वो रास ..सास...आस...या अससस हो....
जय हो...
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