जिस प्रकार कश्मीरी पण्डित अपने राज्य से बेदखल होकर यंहा वँहा शरणार्थीयों सा जीवन जीने को मजबूर है वही स्थिति मध्य प्रदेश के शिक्षा विभाग के नियमित शिक्षक संवर्ग की हो चुकी है।
शिक्षक अपने ही विभाग रुपी राज्य में निर्वासितों सा जीवन जीने को मजबूर किए जा रहे हैं ।
जैसे हालात बाहरी लोगों ने कश्मीर में कर रखे है वही हालात मध्य प्रदेश के शिक्षा विभाग के हो चुके है।
मध्यप्रदेश के अधिकांश प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च तथा उच्चत्तर माध्यमिक विद्यालयों में प्र.अ.और प्राचार्य के पद रिक्त है और उन पर प्रभारी के पदों पर अध्यापक संवर्ग पदासीन है जो की शासन की दोषपूर्ण नीति है।
विभाग का शिक्षक बेबस और लाचार है , उसके पास अपनी पहचान का संकट बन गया है।।
यदि किसी विधायक या मंत्री महोदय से मुलाकात करो उन्हें अपनी पीड़ा बताओ तो वह बिना सुने ही कह देते है की हमारी सरकार ने आपको बहुत दिया है अभी आपको छठा वेतनमान दिया है, सरकार जल्दी ही आपका शिक्षा विभाग में भी संविलियन करेगी आदि आदि।
अब अपनी व्यथा सुनाये तो किसे , हम हमारे ही घर में निर्वासित और दोयम दर्जे का जीवन जीने को मजबूर है।
कहने को शिक्षा विभाग है किन्तु इस विभाग के आला अधिकारी या तो भारतीय प्रशासनिक सेवा के है और कुछ राज्य प्रशासनिक सेवा के और स्थानीय और जिला स्तर के जो अधिकारी नही है किन्तु अधिकारीयों सा रोब झाड़ते है और प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत हैं जेसे डीपीसी, एपीसी, बीआरसीसी,बीएसी, बीजीसी और यंहा तक की सीएसी तक कोई भी शिक्षा विभाग का कर्मचारी नही है ।
शिक्षा विभाग का प्रशासन और मॉनिटरी का कार्य स्थानीय निकाय के कर्मचारी कर रहे है।
नियमित शिक्षक संवर्ग के साथ शासन प्रशासन जान बूझकर सौतेला व्यवहार कर रहा है और विभाग के अधिकारी आँख बंदकर सब कुछ देखते हुवे भी अंजान बने बेठे है शिक्षक अपना राग किसे सुनाये ।
वह दोराहे और चोराहे पर नही , एक अँधेरे कुए में भी नही वरन् एक ऐसी अँधेरी सुरंग में फंस गया है जिसमे रास्ते तो अनेक है लेकिन उसे कहीं भी राह दिखाई नही दे रही है।
अलग अलग जिलो में अलग अलग स्थिति है कही 30 तो कहीं35 वर्ष के सेवाकाल को पूरा कर चुकने के बाद भी उसे एक अदद पदोन्नति भीनही मिल रही है जिसमे सरकार को एक लाल नया पैसा जो कि अब चलन में भी लगभग नही के बराबर है का व्यय भार भी नही आ रहा है लेकिन उसे देने में भी प्रशासन कोई रुचि नही ले रहा है।
यदि ऐसा हो जाये तो विभाग का कार्य और भी आसान हो सकता है किन्तु शासन प्रशासन शायद व्यवस्था बनाने में कम बिगाड़ने में ज्यादा रुचि ले रहा है जिससे की शिक्षा का निजीकरण किया जा सके और बदनाम शिक्षक समाज को किया जाकर असफलता का ठीकरा शिक्षको पर फोड़ा जा सके।
यदि आज की तारीख में सभी हाईस्कूल प्राचार्यो को जिन्हें दो क्रमोन्नति प्राप्त हो चुकी है को +2 प्राचार्य, सभी व्याख्याताओ और प्र.अ.और उच्च श्रेणी शिक्षको को जिन्हें 4200 ग्रेड पे मिल रही है को प्राचार्य हाईस्कूल ,बना दे तो शिक्षको के सम्मान में वृद्धि के साथ विभाग को भी पूर्ण कालिक संस्था प्रधान मिल सकते है वह भी बिना व्यय भार के लेकिन शासन प्रशासन इस और भी उदासीन है।
इसी प्रकार समस्त सहायक शिक्षको को उच्च श्रेणी शिक्षक और वरिष्ठों को प्र अ मा वि बना दिया तथा जाये तथा जो स्नातक नही है तो उन्हें प्राथमिक वि का प्र अ बनाया जाकर सभी को संतुष्ट किया जा सकता है जिस पर किसी का ध्यान नही है।
या तो हम जैसा चल रहा है उसमें ही रहें या विभाग छोड़ दें जो कदाचित संभव नहीं है ।
शासन हमारी किसी भी समस्या के समाधान की ओर अग्रसर नहीं है ।
साथियों जागो उठो और एकजुट होकर आपके अपने ऊपर किये जा रहे अन्याय का प्रतिकार करो।
" अभी नहीं तो कभी नहीं।"
हम अपने विभाग में निर्वासित जीवन नहीं जी सकते।
जिन्दा क़ौमें ज्यादा इंतजार नही कर सकती।
दिनेश चंद्र शर्मा
प्र.अ.
शा.क.मा. वि.जूना ब्यावरा
जिला राजगढ़ म.प्र.
मो.न.-9424478449
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