राज्य अध्यापक संघ मध्यप्रदेश
💥शिक्षा क्रान्ति यात्रा💥
मुख्य उद्देश्य
"अल्पवेतन् भोगी कर्मियों की
समस्याओं से निजात व बेहतर
शासकीय शिक्षा के साथ
गुणात्मक विकास"
सुरेश यादव प्रदेश मीडिया प्रभारी की
कलम से✍.......
💥शिक्षा क्रान्ति यात्रा भाग -3💥
💥साथियों मैने पहले 2 अंक मे बताया था कि राज्य अध्यापक संघ म.प्र. की यह पाँचवी यात्रा है, हमने हमेशा कहा है कि यह सिर्फ हमारे वेतन भत्तो की लड़ाई नहीं समाज हित की लडाई है। मैने विश्व के अन्य विकसित और विकासशील देशो में शिक्षा वयवस्था के बारे में भी जानकारी प्रदान की थी।
💥 आज हम उस से आगे बढ़ते हुए आप को बतायेंगे कि किस प्रकार देश की सरकारी शिक्षा को बर्बाद करने की भूमिका तैयार की गयी और शिक्षा जैसे पवित्र क्षेत्र में अमीर और गरीब के बीच खाई तैयार की गई और उसे किस प्रकार बढ़ाया गया।
💥सर्व प्रथम 1984-85 में देश में शिक्षा विभाग के मंत्रालय को बंद कर के उसका नाम मानव संसाधान विकास मंत्रालय किया गया।
💥फिर वैश्वीकरण व नव उदारवाद का दौर आया, जिसमे 73 वे और 74 वे संविधान संशोधन के माध्यम से शिक्षा को सरकार के हाथ से लेकर स्थानीय निकायों के हाथो में सौंप दिया गया, इस संविधान संशोधन ने तो जैसे सरकार को शिक्षको के शोषण का अधिकार दे दिया। पूरे देश में कम वेतन और बिना किसी सुविधा के शिक्षकों की भर्ती की जाने लगी। इस प्रकार नियुक्त शिक्षकों को भविष्य के प्रति भी सुरक्षा का कोई आश्वाशन नहीं दिया जाता।
💥इसी दौरान निजी विद्यालय भी बनाये जाने लगे और नियमो में शिथिलता के कारण उनकी संख्या बढ़ने लगी, अब तो व्यक्ति की आय के अनुसार विद्यालय होने लगे है।
फिर आया शिक्षा का अधिकार अधिनियम अब यह तो ऊपर वाला ही जाने यह शिक्षा का अधिकार अधिनियम था या सरकारी विद्यालयो को बंद करने का अधिनियम, इसकी एक विशेषता रही है कि इसमें भी शिक्षको की सुविधाओ या अधिकार का कोई उल्लेख नही है। इसके उलट विद्यालय से 25 प्रतिशत छात्र जरूर निजी विद्यालयो में भेजे जाने लगे। परिणाम यह हुआ कि प्रत्येक वर्ष शिक्षको का युक्तियुक्तकरण होने लगा। यही नहीं युक्तियुक्तकरण के नाम पर विद्यालयो को भी मर्ज कर बन्द किया जाने लगा। अब तक प्रदेश में ही 4000 से ज्यादा विद्यालयो का युक्तियुक्तकरण हो गया है और वर्तमान सत्र में 10000 विद्यालय 20 से कम दर्ज संख्या के हो गए है ।
💥आज के नईदुनिया में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है , इस पोस्ट के साथ भेज रहा हूँ। शीर्षक है ,"हाजिरी नहीं बढ़ी मध्यान्ह भोजन से" कुछ अनियमित भुगतान का भी उल्लेख है।
💥यह समाचार कैग की रिपोर्ट पर है, जिसमे बताया गया है कि 2010-11 में प्रदेश में माध्यमिक स्तर तक 1 करोड़ 11 लाख छात्र अध्ययनरत थे और 2014-15 में 92 लाख 51 हजार रह गए। वहीँ निजी विद्यालयो में इसी दौरान 38 प्रतिशत नामांकन बड़ा है।
💥कैग (नियंत्रक महा लेखा परीक्षक) की यह रिपोर्ट है तो मध्यान्ह भोजन के संदर्भ में लेकिन एक बहुत बड़ी सच्चाई हमारे सामने लाती है। अगर हम देखें तो 2011-12 से 25 प्रतिशत छात्रो को निजी विद्यालय में भर्ती करने का अभियान शुरू हुआ है। हम राज्य सरकार के वर्तमान बजट को उठा कर देखें तो सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा, इस बजट तक 8 लाख छात्रो को निजी विद्यालयो में दर्ज करवाया गया है। साथ ही सरकार स्वयं स्वीकार कर चुकी है कि प्रत्येक बच्चे की शाला के साथ मेपिंग में भी 12 या 13 लाख बच्चे कम हुए है या दोहरी मेपिंग के पाये गए है। साथियों स्मरण रहे आगामी सत्र में राज्य सरकार ने 9 लाख 50 हजार बच्चों की फ़ीस का भुगतान करके निजी विद्यालयो में भेजने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए 300 करोड़ रूपये का बजट में प्रावधान किया गया है।
💥यह मेरे नहीं सरकारी आंकड़े हैं। इन्ही आंकड़ो से सरकार विभाग को और हमें बदनाम कर रही है। शिक्षा क्रान्ति यात्रा में हम इन्ही मुद्दों को सभी साथियों के बीच पहुंचा रहे हैं।
✍.....सियाराम पटेल प्रदेश प्रदेश मीडिया प्रभारी की कलम से...✍.....
💥साथियों मैं सुरेश यादव जी के तथ्यों से सहमति व्यक्त करते हुए आपको अवगत कराना चाहता हु कि
वैश्वीकरण व नव उदारवाद का दौर आया, जिसमे 73 वे और 74 वे संविधान संशोधन के माध्यम से शिक्षा को सरकार के हाथ से लेकर स्थानीय निकायों के हाथो में सौंप दिया गया, इस संविधान संशोधन के तहत प्रदेश सरकार ने भी संभवतः ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड के तहत शिक्षा विभाग में अंतिम नियमित शिक्षक भर्ती के उपरान्त राज्य स्तर पर भी भर्ती नियमों में संशोधन कर स्थापना व्यय में कटौती करते हुए शिक्षा विभाग में संभवतः माननीय सुन्दरलाल पटवा जी के नेतृत्व में बनी सरकार द्वारा 1992 में अल्पवेतन भोगी कर्मी कल्चर का सूत्रपात करते हुए मानसेवी शिक्षक की भर्ती प्रक्रिया के तहत अल्वेतन भोगी वगैर सुविधा प्राप्त शिक्षक की नियुक्ति का 89 दिन के लिए शुभारंभ किया गया। तत्पश्चात 1993 -94 में राष्ट्रपति शासन के दौरान स्थानीय निकायों को स्कूलों में शिक्षक के नाम पर भर्ती का अधिकार सौंपते हुए कर्मी कल्चर का सूत्रपात करते हुए हुए शिक्षाकर्मी भर्ती की गयी जो 1994 में 89 दिन में सेवा समाप्त कर दी गयी। तत्पश्चात माननीय दिग्विजय सिंह जी के नेतृत्व में म.प्र.शासन द्वारा त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था के नाम पर स्थानीय निकायों को अधिकार सौंपते हुए शिक्षाकर्मी के भर्ती प्रक्रिया के नाम से अल्पवेतन भोगी बगैर सुविधा प्राप्त कर्मियों की 500 रूपये के मासिक पर नियुक्ति का सूत्रपात किया गया जिसका दंश हम आज भी झेल रहे हैं। 1995 में नियुक्ति उपरान्त 1998 में माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा उस नियुक्ति को अवैधानिक घोषित कर 3 तीन साल की सेवाएं समाप्त कर दी गयी। जिसके विरुद्ध राज्य अध्यापक संघ ने तत्काल माननीय सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करते हुए संभवतः अक्टूबर -नवम्वर 1998 में सेवा शर्तों में सशोधन कराते हुए पुनः शिक्षाकर्मी भर्ती प्रक्रिया के तहत नियुक्ति कराने में सफलता प्राप्त की। तत्पश्चात 2000 में जंग जीतते हुए नियमितीकरण कराया। तत्पश्चात दिल्ली तक संघर्ष करते हुए अध्यापक संवर्ग का गठन कराया गया। किन्तु शिक्षाकर्मी के बाद संविदा शिक्षक व अब अतिथि शिक्षक नियुक्ति की जा रही है। प्रति तीन साल उपरान्त संविदा शिक्षक भर्ती क्यों नही ? अतिथि क्यों ? अतिथि भी पर उन्हें वेतन क्यों नही?
और 2013 में चतुर्थ वार्षिक किश्तों में छटे वेतन का लाभ व 2015 में 26 अक्टूम्बर 2015 में माननीय मुख्यमंत्री जी से वार्ता कर छटे वेतन की घोषणा में महती भूमिका का निर्वहन करते हुए अपना दायित्व का निर्वहन किया ।
जागो अध्यापक जागो।
आपका अपना
सियाराम पटेल
प्रदेश मीडिया प्रभारी
राज्य अध्यापक संघ मध्यप्रदेश।
सौजन्य से -
आई टी सेल
राज्य अध्यापक संघ मध्यप्रदेश
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